वित्तीय संकट से सफलता की मंजिल तक: श्रीमती यतला श्रावंती की प्रेरणादायक कहानी
उच्च शिक्षा और रिसर्च के सफर में पैसों की कमी अक्सर कई होनहार छात्रों का सपना बीच में ही तोड़ देती है। कई बार संसाधनों की भारी कमी और आर्थिक तंगी के कारण योग्य युवा उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। लेकिन अगर समय पर सही वित्तीय मदद मिल जाए, तो बड़ी से बड़ी बाधा को भी आसानी से पार किया जा सकता है। इसका सबसे बेहतरीन और जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं तेलंगाना के करीमनगर जिले की रहने वाली 37 वर्षीय श्रीमती यतला श्रावंती। उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और सरकारी मदद के दम पर वनस्पति विज्ञान (Botany) में अपनी डॉक्टरेट (Ph.D.) की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली है।
श्रीमती श्रावंती के लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। शोध कार्य के शुरुआती दौर में उन्हें गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे महंगी पुस्तकें, आवश्यक शोध उपकरण, सॉफ्टवेयर और छात्रावास (हॉस्टल) का खर्च आसानी से उठा सकें। इसके अलावा, दूरदराज के क्षेत्र से आने के कारण उनके पास गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट, आधुनिक शैक्षिक संसाधनों और उचित अकादमिक मार्गदर्शन तक की भी सीमित पहुंच थी। इन तमाम बाधाओं के चलते कई बार स्थिति ऐसी बन गई थी कि यदि उन्हें समय पर सहायता न मिलती, तो उन्हें कर्ज लेने या अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर नौकरी तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ सकता था।
ऐसे कठिन समय में उनके लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति छात्रवृत्ति योजना (NFSC) एक बड़ा संबल बनकर सामने आई। वर्ष 2017 से शुरू हुई इस योजना के तहत उन्हें फैलोशिप, मकान किराया भत्ता और आकस्मिक सहायता (Contingency) के रूप में कुल 21 लाख रुपये की आर्थिक मदद प्राप्त हुई। इस वित्तीय सहायता ने उनके जीवन से जुड़े आर्थिक तनाव और बोझ को काफी हद तक कम कर दिया। नियमित मासिक फैलोशिप मिलने के कारण वे बिना किसी मानसिक दबाव के पूरी तरह से अपने शोध कार्य पर ध्यान केंद्रित कर सकीं। साथ ही, आकस्मिक सहायता राशि से उनके लिए जरूरी किताबें, रिसर्च मटेरियल और साफ्टवेयर खरीदना भी बेहद आसान हो गया।
इस योजना ने केवल उनकी आर्थिक जरूरतों को ही पूरा नहीं किया, बल्कि उनके पेशेवर विकास के लिए नए रास्ते भी खोले। इस फेलोशिप के सहयोग से उन्हें राष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाओं और सेमिनारों में हिस्सा लेने का बहुमूल्य अवसर मिला। इन मंचों पर उन्होंने अपने शोध निष्कर्षों को प्रस्तुत किया, देश भर के बड़े विशेषज्ञों के साथ सीधा संवाद किया और महत्वपूर्ण अकादमिक प्रतिक्रिया प्राप्त की। इन अनुभवों ने उनके अकादमिक आत्मविश्वास को मजबूत किया और शोध समुदाय के साथ उनके संपर्कों का दायरा काफी व्यापक बना दिया।
आज अपनी इस बड़ी सफलता के बाद श्रीमती श्रावंती का लक्ष्य उच्च शिक्षा या नीति अनुसंधान के क्षेत्र में अपना भविष्य संवारना है। इसके साथ ही, वह अपने लंबे अकादमिक अनुभव और संघर्षों से सीखे गए पाठ का उपयोग वंचित पृष्ठभूमि के अन्य उभरते छात्रों का मार्गदर्शन करने के लिए करना चाहती हैं। श्रीमती यतला श्रावंती की यह संघर्ष गाथा यह साफ तौर पर दिखाती है कि किस प्रकार समय पर मिलने वाला सरकारी सहयोग और वित्तीय सहायता वंचित और जरूरतमंद छात्रों की पूरी जिंदगी बदल सकती है। यह कहानी देश के उन तमाम युवाओं के लिए एक मजबूत प्रेरणा है जो संसाधनों के अभाव में अपने सपनों को अधूरा छोड़ देने पर मजबूर हो जाते हैं।
