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इसरो के उपग्रह ने दर्ज किया अल नीनो का प्रभाव: समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव

 



भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने महासागरों पर अल नीनो (El Niño) के बढ़ते प्रभाव को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। अंतरिक्ष से पृथ्वी की निरंतर निगरानी कर रहे इसरो के अत्याधुनिक उपग्रह EOS-06, जिसे ओशनसैट-3 (Oceansat-3) के नाम से भी जाना जाता है, ने महासागरों के भीतर हो रहे असाधारण बदलावों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया है।


नवीनतम उपग्रह डेटा के अनुसार, जून 2026 के महीने में महासागरों में 'क्लोरोफिल-ए' (Chlorophyll-a) के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई है। यह कमी मुख्य रूप से 'फाइटोप्लांकटन' (phytoplankton) यानी सूक्ष्म समुद्री पौधों की वृद्धि में आई भारी गिरावट का संकेत देती है। फाइटोप्लांकटन संपूर्ण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (marine ecosystem) का मूल आधार माने जाते हैं। ये समुद्री जीवों और मछलियों के लिए भोजन का प्राथमिक स्रोत होने के साथ-साथ पृथ्वी के पर्यावरण संतुलन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इनकी संख्या में कमी का सीधा असर समुद्री जीवन और वैश्विक मत्स्य पालन पर पड़ सकता है।

क्लोरोफिल में इस भारी कमी के साथ-साथ, उपग्रह ने समुद्र की सतह पर चलने वाली हवाओं (surface winds) के पैटर्न में भी महत्वपूर्ण बदलाव का पता लगाया है। इसरो के अनुसार, ये सभी परिवर्तन 2026 में तेजी से विकसित हो रहे अल नीनो के प्रत्यक्ष और गहरे प्रभाव को दर्शाते हैं। अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है जो न केवल समुद्री वातावरण को बदलती है, बल्कि दुनिया भर के मौसम चक्र को भी प्रभावित करती है।

जब इसरो ने इन वर्तमान आंकड़ों की तुलना वर्ष 2024 और 2025 के महासागरीय डेटा से की, तो यह स्पष्ट हो गया कि इस साल अल नीनो महासागरों पर अधिक व्यापक प्रभाव डाल रहा है। अंतरिक्ष से प्राप्त ये सटीक आंकड़े जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के वास्तविक और जमीनी प्रभावों की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं।

इसरो की यह उन्नत निगरानी प्रणाली वैज्ञानिकों को भविष्य के मौसम और समुद्री बदलावों के लिए बेहतर रूप से तैयार रहने में मदद कर रही है। इस विषय पर विस्तृत डेटा और जानकारी NICES पोर्टल पर उपलब्ध है।