इंदौर में बना एशिया का सबसे बड़ा हाई स्पीड टेस्टिंग ट्रैक, जानें इसकी खासियत
इंदौर एमपी इंदौर जिले स्थित पीथमपुर (Pithampur High Speed Car Testing Track) में एशिया का सबसे बड़ा हाई स्पीड टेस्टिंग ट्रैक बनकर तैयार हो गया है। सोमवार को वर्चुअली केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने उसका उद्घाटन किया है। इस ट्रैक पर 250 किमी की रफ्तार से सुपर कार (Super Car High Speed Testing Track) की टेस्टिंग हो सकेगी। पीथमपुर में बने ट्रैक की लंबाई 11.30 किलोमीटर है। दुनिया में सबसे लंबे ट्रैक की लंबाई 21 किलोमीटर है, जो जर्मनी में है। पीथमपुर ट्रैक दुनिया में पांचवां सबसे लंबा है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इंदौर के पीथमपुर में बने स्पीड टेस्टिंग ट्रैंक का उद्घाटन वर्चुअली किया है। इस ट्रैक पर 250 किमी की रफ्तार से हाई स्पीड कार की टेस्टिंग होगी। वहीं, कर्व पर 308 किलोमीटर की रफ्तार से टेस्टिंग संभव है। हालांकि स्ट्रेट लाइन पर इसकी कोई स्पीड लिमिट नहीं है। उद्घाटन से पहले लेंबागिनी कार की यहां स्पीड टेस्ट हुई थी। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि है। भारत ऑटो मोबाइल सेक्टर के लिए केंद्र है। उन्होंने कहा कि यह मेक इन इंडिया की उपलब्धि है। क्या है खासियत पीथमपुर में बने इस हाई स्पीड टेस्टिंग ट्रैक की लंबाई 11.30 किलोमीटर है। चौड़ाई 16 मीटर है और शेप ओवल है। एशिया में इससे लंबा टेस्टिंग ट्रैक नहीं है। यहां पर हाई स्पीड कैटेगरी की कार मर्सिडीज, टेस्ला, ऑडी, फेरारी, लेम्बोर्गिनी और बीएमडब्ल्यू की टेस्टिंग की जा सकती है। इस ट्रैक को बनने में करीब तीन साल लगे हैं। इसमें कुल 512 करोड़ रुपये की लागत आई है। एमपी में इंडस्ट्रियल हब है पीथमपुर एमपी में पीथमपुर बड़ा इंडस्ट्रियल हब है। मध्य भारत का यह सबसे बड़ा ऑटो सेक्टर है। यहां पर महिंद्रा, एवरटेक, फोर्स, हिंदुस्तान मोटर्स, वॉल्वो और आयशर समेत बड़ी कंपनियों के 100 से अधिक प्लांट हैं। यहां स्पेयर पार्ट्स भी तैयार किए जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल यहां से 25-30 हजार करोड़ रुपये का कारोबार होता है। साथ ही 20 हजार से अधिक लोगों को रोजगार भी मिलता है। यह टेस्टिंग ट्रैक करीब 3000 एकड़ में फैला हुआ है। इस ट्रैक पर टेस्टिंग के लिए देश और विदेश से गाड़ियां आएंगी। इससे इंदौर में रोजगार के नए अवसर भी सामने आएंगे। भारत में ऐसा ट्रैक नहीं होने की वजह से स्पीड टेस्टिंग के लिए गाड़ियां विदेश में जाती थीं।
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