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संपादकीयः अपराधीकरण पर अंकुश के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसले

राजनीति के अपराधीकरण की तेज होती प्रक्रिया के मद्देनजर इस हफ्ते एक ही दिन आए सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसले ध्यान देने योग्य हैं। दोनों फैसलों की खास बात यह है कि इनमें उन पक्षों की अपराधीकरण को बढ़ावा देने वाली भूमिका रेखांकित होती है, जिनसे उस पर अंकुश लगाने की अपेक्षा की जाती है। पहले मामले में मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली बेंच ने मंगलवार को यह निर्देश जारी किया कि मौजूदा या पूर्व सांसदों और विधायकों के खिलाफ कोई भी आपराधिक केस राज्य सरकारें अपने स्तर पर वापस नहीं ले सकतीं। उन्हें इसके लिए हाईकोर्ट से इजाजत लेनी होगी। यह निर्देश जारी करने का फैसला जल्दबाजी में इसलिए लेना पड़ा क्योंकि अमाइकस क्यूरी (कोर्ट मित्र) की रिपोर्ट के मुताबिक, कई राज्य सरकारें ऐसे मामले वापस लेने की कोशिश में हैं। एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने बीजेपी और कांग्रेस सहित तमाम प्रमुख दलों पर अपने प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठभूमि को सही ढंग से उजागर न करने के कारण जुर्माना लगाया। मामला सुप्रीम कोर्ट के ही फरवरी 2020 में दिए गए एक फैसले से जुड़ा है, जिसके मुताबिक प्रत्याशियों को अपनी डीटेल्स या तो चयन के 48 घंटे के अंदर या फिर नामांकन पत्र भरे जाने की पहली तिथि से कम से कम दो हफ्ते पहले तक अपलोड कर देनी थीं। अदालत के सामने लाई गई अवमानना की शिकायत में कहा गया कि संबंधित दलों ने बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान अदालत के इस आदेश का ढंग से पालन नहीं किया। कोर्ट ने इस शिकायत को सही पाते हुए न केवल दोषी दलों पर जुर्माना लगाया बल्कि अपने पिछले आदेश में संशोधन करते हुए यह भी कहा कि आगे से सभी दलों को प्रत्याशी के चयन के 48 घंटे के अंदर न केवल उनकी सूचना अपनी वेबसाइट पर डालनी होगी बल्कि दो समाचारपत्रों में भी छपवाना होगा। हालांकि इस मसले पर जब-तब यह राय भी प्रकट की जाती रही है कि शासन और पुलिस द्वारा अक्सर कई झूठे मामले राजनीतिक इरादों के तहत भी दर्ज कर लिए जाते हैं, जो आगे चलकर अदालतों में खारिज हो जाते हैं। ऐसे में पुलिस केस के आधार पर किसी उम्मीदवार के बारे में क्यों राय बनाई जाए? लेकिन समझना होगा कि इन आदेशों में न तो उम्मीदवारों के चुने जाने के अधिकार पर कोई रोक लगाई गई है और न ही चुनने के वोटरों के अधिकार को सीमित किया गया है। सिर्फ यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि वोटरों से जरूरी तथ्य न छुपाए जाएं। राजनीतिक दलों के इसी ढीले-ढाले रवैये के चलते संसद में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सदस्यों की संख्या पिछले चार आम चुनावों के दौरान 24 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी तक पहुंच गई। जाहिर है, राजनीति के अपराधीकरण को अब और हल्के में लेना लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है।


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