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रचना – अष्टद्रव्यपूजा गीत

रचना – अष्टद्रव्यपूजा गीत

 

अष्टद्रव्य से पूजा करें, भावों का विस्तार,

प्रभु चरणों में अर्पित करें, श्रद्धा अपार।

जल-चंदन-अक्षत-पुष्प, नैवेद्य दीप उजियार,

धूप-फल से पूर्ण हो, प्रभु का सत्कार॥

 

जल चढ़ाऊँ चरणों में, समर्पण का भाव,

जैसे बहता निर्मल जल, नम्र बने स्वभाव।

हे प्रभु! ऐसा विनय दे, मन हो निर्मल-नीर,

तेरे चरणों में बसूँ, मिटे अहंकार की पीर॥

 

चंदन तिलक लगाऊँ मैं, श्रद्धा का आधार,

हृदय में तेरा स्मरण, हो जीवन साकार।

तेरे प्रति विश्वास से, भर जाए यह मन,

हर श्वास में बस जाए, प्रभु तेरा ही ध्यान॥

 

अक्षत अर्पण करूँ मैं, भेद-विज्ञान का प्रकाश,
सत्य-असत्य का भान हो, मिटे अज्ञान का त्रास।
शुद्ध चेतना जागे अब, अंतर का हो सुधार,
तेरी वाणी से मिले, जीवन को आधार॥

 

पुष्प चढ़ाऊँ प्रेम से, हृदय की यह पुकार,

भावों की सुगंध से, महके सारा संसार।

प्रेम ही पूजा सच्ची है, प्रेम ही तेरा द्वार,

तेरे चरणों में मिले, जीवन का सार॥

 

नैवेद्य अर्पित करूँ, तुझको ही समर्पण,

जो कुछ पाया है प्रभु, तुझको ही अर्पण।

तेरी कृपा से मिला सब, हे पतित-पावन,

सेवा में ही सुख मिले, धन्य हो यह जीवन॥

 

दीप जलाऊँ ज्ञान का, मिटे अज्ञान अंधेरा,

तेरी कृपा से जागे, अंतर का सवेरा।

ज्ञान-ज्योति जलती रहे, हर पल हर बार,

तेरे मार्ग पर चलूँ, हो जीवन का उद्धार॥

 

धूप चढ़ाऊँ भाव से, सद्गुण की महक,

जैसे सुगंध फैलती, वैसे गुण चमक।

करुणा, दया, क्षमा भर दे, ऐसा हो व्यवहार,

तेरी भक्ति में ढले जीवन, हो भव-पार॥

 

फल अर्पित करूँ, प्रभु कृपा बरसाए,

सार्थक हो यह जीवन, मिटे जन्म का जाल।

तेरे चरणों में मिले, कर्मों का विश्राम,

फलवान हो आराधना, पूर्ण हों सब काम॥

 

अष्टद्रव्य की यह पूजा, भावों की पहचान,

समर्पण से फल तक का, सुंदर यह विधान।

हे जिनवर! कृपा करो, रहे अटल यह प्रीति,

प्रभु चरणों मेंराहत”, बसती रहे भक्ति॥  

 

 

राहत टीकमगढ़”