ब्लॉगः जब नॉर्थ-ईस्ट के एक गांव में दो परिवारों वाले बूथ पर हुई री-पोलिंग
कोई भी चुनाव हो और उसमें शेषन याद न किए जाएं, यह मुमकिन ही नहीं। सच पूछा जाए तो उन्होंने ही चुनाव आयोग को उसकी असली ताकत का अहसास कराया। बतौर चुनाव आयु्क्त उन्होंने अपने फैसलों की कोई सीमा तय नहीं की। एक बार लिए अपने फैसले को पलटना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था। उनके साथ काम कर चुके अधिकारियों के पास उनसे जुड़ी ऐसी तमाम यादें हैं जो उन्हें कई मौकों पर हंसने का कारण भी दे देती हैं। शेषन के ही कार्यकाल का यह फैसला था कि अधिकतम वोटिंग होनी चाहिए और इसके लिए राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पहल करनी होगी। उस वक्त के एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी को याद है नॉर्थ ईस्ट की वह घटना।
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