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कविता - "प्रभु चरणों में ही रखना”

प्रभु चरणों में ही रखना


याद रखूँगा मैं ये कृपा तेरी, ओ देव मेरे

सिर पे सजाया तूने हाथ मेरे, ओ नाथ मेरे

मैं मन को समझा लूँगा, मैं मन को समझा लूँगा

प्रभु चरणों में ही रखना...


जिहाल-ए-किस्मत बदल दे आकर,

शरण में तेरी बेचारा दिल है...

सुनाई देती है जिसकी धड़कन,

वो नाम तेरा महावीर प्रभु है!

सुनाई देती है जिसकी धड़कन,

वो नाम तेरा आदिनाथ प्रभु है!


टूटे इस मन को जोड़े कैसे, राह ये बताते जाओ

भव से तरने की बस हमको, एक वजह दे जाओ

यूँ ना फिरो हमसे, नज़रें तो मिलाते जाओ

कोई नवकार दे जाओ, कोई तारन दे जाओ...


मेरे लिए थोड़ी सी, मेरे लिए थोड़ी सी

चरणों में जगह रखना...


जिहाल-ए-किस्मत बदल दे आकर,

शरण में तेरी बेचारा दिल है...

सुनाई देती है जिसकी धड़कन,

वो नाम तेरा महावीर प्रभु है!


ख़ुशी तुम्हारी है जब भक्ति में, तो हम भी खुद को डूबा ही लेंगे

वजह जो पूछेगा ये ज़माना, प्रभु नाम हम बता ही देंगे

चाहे जो दुख आए, वो तो मेरी तकदीर है

प्रभु का दर्शन पाना, जीवन की तस्वीर है...


जब तक न मोक्ष पाएँ, उस पल का इंतज़ार है

इतना ही कहना...


जिहाल-ए-किस्मत बदल दे आकर,

शरण में तेरी बेचारा दिल है...

सुनाई देती है जिसकी धड़कन,

वो नाम तेरा महावीर प्रभु है!

सुनाई देती है जिसकी धड़कन,

वो नाम तेरा आदिनाथ प्रभु है!


"राहत टीकमगढ़"