दशलक्षण पर्व पर हुई उत्तम तप धर्म की आराधना
Publish Date: | Sun, 30 Aug 2020 04:13 AM (IST)
छिंदवाड़ा। दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन शनिवार को सकल दिगंबर जैन समाज ने उत्तम तप धर्म की आराधना करते हुए उसका स्वरूप जाना। रविवार को आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना होगी। पंडित ज्ञायक शास्त्री ने बताया कि महापर्व के अवसर पर अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन एवं सम्यक पाठशाला उदयपुर के तत्ववधान में शाम 7 बजे से अन्तर्राष्ट्रीय बाल-युवा ई कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। जिसकी अध्यक्षता मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ फेडरेशन के प्रांतीय मीडिया प्रभारी दीपकराज जैन करेंगे। मुख्य अतिथि उदयपुर नेमिनाथ कॉलोनी फेडरेशन के अध्यक्ष निर्मलकुमार अखावत एवं विशिष्ठ अतिथि – पण्डित कार्तिक शास्त्री बांदा रहेंगे। इस अवसर पर विशिष्ट कवि – युवा विद्धवान पंडित सिद्धार्थ सिंघई के साथ ‘वीर’ संयम जैन, कुमारी ?ुशबू अम्बर, ‘दिवाकर’ ईशान मेहता, कुमारी नम्रता ‘नम्र’, राचित ‘निराला’, कुमारी आर्या जैन एवं संवर जैन ‘ज्ञाता’ कविता पाठ करेंगे। उत्तम तप धर्म पर प्रवचन करते हुए पं.रजनीभाई दोशी ने कहा कि कषाय का शोषण तप है, तप सा निर्जरा, यह तत्वार्थ सूत्रजी कहता है, लेकिन इच्छा निरोध का नाम तप है। आत्मा के आश्रय से इच्छा का नाश होना वह तप है। जैसे धूप में कपड़े सूख जाते हैं वैसे ही तप से कर्म और इच्छा सूख जाती है। दिगंबर महामुनिराज 12 प्रकार के तप करते हैं। जैसे गर्मी मे तप्त व्यक्ति को ए.सी. शीतलता प्रदान करता है वैसे ही संसार मे कषाय से तप्त जीव को ये तप शीतलता प्रदान करते हैं।
पंडित अंकुर शास्त्री ने छहढाला की कक्षा में आश्रव तत्त्व की चर्चा करते हुए कहा कि वास्तव में यह जीव आश्रव के कारण ही हैं। कर्मों के आश्रव के कारण मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद और कषाय रूप परिणाम हैं। जिनके कारण मन-वचन-काय रूप योग के निमित्त से कर्म आते हैं और जीव के साथ बंधकर उसे दुखी करते हैं। जिनेन्द्र भगवान के वचन ऐसी औषधि हैं जिसके ग्रहण से इन आश्रव के संक्रमण से मुक्ति मिलती है। इसलिए कर्म आश्रव से छूटने के लिए जिनवचन की शरण ही मंगलकारी है। जिनवाणी के बताए मार्ग पर चलने से ही जीव आश्रव-बंध से छूटकर संवर निर्जरा रूप परिणमित होता हुआ मोक्ष को प्राप्त करता है।
Posted By: Nai Dunia News Network
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